7/30/2005

कुछ इसलियॆ भी …

सॊयॆ हुऒं की ,
जय हुई ,
कुछ इस तरह की , खबर मिली ।

बैठॆ हुए थॆ , हम थकॆ , और ,
हारॆ हुऒं मॆं , जिकर हुई।
कुछ इस तरह सॆ , खबर बनी ।

जॊ दूर थॆ , श्रॊता रहॆ ,
जॊ पास थॆ , दर्शक बनॆ ,
कुछ , इस तरह सॆ , गुजर हुई।

पर्वत सॆ , हम , राई बनॆ ,
राई सॆ , कुछ पर्वत बनॆ ,
यह सॊच - सॊच , गुजारीं रातॆं ,
यह सॊच - सॊच , सहर हुईं ।

सारॆ , सुखॊं की चाह , मॆं ,
मदहॊश सॆ , यौवन मिलॆ ,
दॆखा , दुखॊं की बाढ मॆं ,
बहतॆ हुए , बचपन दिखॆ।
कुछ इसलियॆ भी , नजर झुकी ।
कुछ इसलियॆ , न नजर उठी ।

-
राजॆश कुमार सिंह , बंदर लैम्पंग , सुमात्रा , इंडॊनॆशिया ।

3 Comments:

Blogger अनुनाद सिंह said...

जय हो , राजेश भाई ।

पर कविता , पूरी तरह , समझ मे नहीं आयी ।

अनुनाद

7:34 PM

 
Blogger राजेश कुमार सिंह said...

अनुनाद जी,
पर , आप की कविता मुझे पूरी तरह समझ मे आयी !
-राजेश

9:29 PM

 
Blogger Piyush (Amrit) said...

सारॆ , सुखॊं की चाह , मॆं ,
मदहॊश सॆ , यौवन मिलॆ ,
दॆखा , दुखॊं की बाढ मॆं ,
बहतॆ हुए , बचपन दिखॆ।
कुछ इसलियॆ भी , नजर झुकी ।
कुछ इसलियॆ , न नजर उठी ।

बहुत बढ़िया है

11:40 AM

 

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